मित्रों मेरे पिछले लेख "विकासशीलता और उदासीनता" को लिखे हुए अभी पाँच दिन ही हुए और उसी विषय पर एक नई कड़ी लेकर आना पड़ा। उस लेख http://awiresham1.blogspot.in/2017/11/blog-post_9.html मे मैंने भारत के विकास में एक बड़े अवरोध "सामाजिक उदासीनता" को बताया था। मेरे पिछले लेख पर हर प्रकार की टिप्पड़ियाँ आयीं थी। कुछ लेख पर ही थी और कुछ मेरे फोन और पत्रों (email और Twitter पर DM) में आए थे। कुछ आशीर्वाद के स्वर थे तो कुछ विरोधी। विरोधी टिप्पड़ियों में जो एक बात समान थी वो ये थी की विकास, एक सरकार द्वारा चलाई जाने वाला कार्य और प्रक्रिया है और उसमें कहीं से भी सामाजिक उदासीनता या हीनता अवरोध नहीं पैदा कर सकता, यह एक "भगवा" भ्रांति और बहाना है। भगवा इसलिए क्योंकि मेरी छवि उनके मस्तिष्क मे एक भाजपा समर्थक की है। विश्वास करें मैं अपने लेखों में, अभी तक, किसी भी दल का ना समर्थक रहा हूँ और न ही विरोधी। यदि भारतीय संस्कृति की बात करने भर से मेरी सोच में किसी को मेरे "भाजपापन" का अहसास होता है तो उसमे मेरी कोई ग़लती नहीं है इतना सब कुछ कहने के बाद भी, इ...