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विकासशीलता और उदासीनता

आज बहुत दिनों बाद एक नये विषय को लेकर लेख लिख रहा हूँ। ऐसा नहीं की लेखन से मन उचट गया था या विषय गूढ़ था बल्कि ऐसा इसलिए है कि विषय इतना वृस्त्रित था कि उसका एक लेख में पठनीय संकलन नहीं कर पा रहा था। अन्तोगत्वा निर्णय लिया कि विषय पर धारावाहिक लेख लिखूंगा।
ये तो हुई मेरी देरी की बात, अब विषय पर आते हैं। चूंकि विषय मेरी समझ मे गूढ़ है इसलिए इसे क्रमबद्ध चरणों मे प्रस्तुत करूँगा।
प्रथम चरण में लेते हैं, "देश का विकास"। देश का विकास बाधित है या मनवांछित गति से नहीं हो पा रहा है, ये एक ऐसा कथन है जिससे 99% लोग सहमति जताएंगे किन्तु जब इसके कारण पर कुछ कहना होगा तो या तो सब चुप या बिखरे हुए विचार आयेंगे। पूँजी की कमजोरी एक सबसे मजबूत और सर्वमान्य कारक के तौर पर उभर कर प्रस्तुत की जाती है लेकिन पूंजी की कमी कभी विकास में बाधक नहीं होती। इस कथन के एक नहीं अनेक उदाहरण भरे पड़े हूं इतिहास में। धीरू भाई अम्बानी को लें या बिल गेट्स, पूंजी नहीं थी उनके पास लेकिन उन्होंने विकास को रुकने नहीं दिया। लेकिन यदि पूंजी आवश्यक नहीं होती विकास के लिये तो क्या आवश्यक होता है? मेरे विचार से केवल दो चीजें, सही दिशा और इच्छाशक्ति। मेरा विचार कहता है कि भारत मे विकास में बाधा का कारक केवल इच्छाशक्ति की कमी है। कई पाठकों की भवें तन गयी होंगी इस बात पर लेकिन सोचें कि वो केवल इच्छाशक्ति ही थी जिसने दशरथ मांझी को प्रेरित किया था पहाड़ का सीना तोड़ने वास्ते, पूंजी नहीं थी उनके पास।
यहाँ तक तो पहुंच गये, लेकिन आगे क्या? कहाँ है इच्छाशक्ति की कमी? मोदी जी परम् विचारक, उनके मंत्री भी उनके साथ, नौकरशाहों को भी दोष नहीं दिया जा सकता, तो विकास के बहाव में रुकावट कहाँ आ रही है?
यहाँ तक पहुँचने के बाद वही पुरानी समस्या की रस्सी का छोर है कहाँ? जब समस्या पुरानी हो तो हल भी पुराना होना चाहिये और पुराना हल कहता है कि "खोज शुरुआत से करो" (Back to Basics)। मैं भी जड़ों को ढूंढने लगा, राष्ट्र और राष्ट्र की परिभाषा की गहराइयों को ढूंढना शुरू किया। विश्वास करें समस्या का छोर तो मिल गया लेकिन अब उसका हल ढूंढना मुश्किल हो गया था मेरे अकेले के लिये।
राष्ट्र, ये अपनेआप में एक बहुत छोटा लेकिन बड़े अर्थ वाला शब्द है। एक मनुष्य की प्रथम पहचान एक व्यक्तिनके रूप में होती है, कुछ मनुष्यों का एक परिवार, कई परिवारों का एक समाज और ऐसे ही अनेक समाजों के मिलन को राष्ट्र की संज्ञा दी जाती है। मतलब व्यक्ति➡️परिवार➡️समाज➡️राष्ट्र, ये कड़ी है राष्ट्र निर्माण की। अब इस कड़ी में कहाँ कमजोरी है जो राष्ट्र का विकास नहीं हो रहा? मुझे तो आजतक एक भी ऐसा मनुष्य नहीं मिला जी विकास न करना चाहता हो। हर एक मनुष्य स्वयं को आगे बढ़ाना चाहता है तो हमारा राष्ट्र आगे क्यों नहीं बढ़ रहा?
इस कड़ी का कोई एक मनका कमजोर पड़ रहा है। मनुष्य खरा उतर चुका है और राष्ट्र तो स्वयं अपनी असफलता के कारणों को ढूंढ रहा है तो बचे केवल परिवार और समाज। इन दोनों मनकों पर चिंतन और विमर्श करते हुए एक ऐसा पक्ष उजागर हुआ जो पूरे समस्या का कारक है। यहां मैं ये बताना आवश्यक समझता हूँ कि किसी भी उलझन के समय मैं वाद और विमर्श के लिये सबसे पहले अपने पिताजी की तरफ ही जाता हूँ। हमेशा सोच यही रहती है कि घर के मामलों में तो उन्ही की सुनी जाती है लेकिन शायद राष्ट्रीय और सामाजिक विषयों में मेरी भी दाल थोड़ी गल जाये।
जो दो विचार पिताजी ने रखे उनमें पहला ये था कि ऐसा कोई भी परिवार प्रगति नहीं कर पाता जिसमें किसी एक व्यक्ति का हठ, अहं और सम्मान पूरे परिवार की आवश्यकता, अहं और सम्मान से अधिक हो। यही नियम पूरी की पूरी कड़ी पर लागू होती है। अब ये मेरा भारत, जहाँ केवल एक "शाह बानो" के लिये देश के संविधान में संसोधन किया जा सकता है, उस देश से कैसे उम्मीद करें कि वो प्रगति करे?
दूसरा विचार जो हमारे वाद में उभर कर सामने आया था, वो था कि वर्तमान समाज की स्थिति से उसके परिभाषा की तुलना। समाज, एक समान आय वर्ग, एक समान समस्याओं और एक समान रिहाइश वाले परिवारों का वर्ग होता है जिसके कुछ अलिखित नियम होते है। इस समाज के इसके हर एक व्यक्ति से और इसके हर एक सदस्य को इस समाज से कुछ अपेक्षाएं और आकांक्षायें होती हैं। लेकिन वर्तमान परिस्थिति में अधिकतर व्यक्ति अपनी सामाजिक आकांक्षायें तो पूरी करना चाहता है लेकिन जब प्रश्न अपेक्षाओं का आता है तो उसका उत्तर होता है कि "मुझे क्या" या "मैं ही क्यों"। अधिकतर जगहों पर इन अपूर्ण अपेक्षाओं की क्षतिपूर्ति वहः व्यक्ति बड़े बड़े जलसों में धन खर्च कर या आसान लोकप्रियता की किसी और साधन से समाज को रिश्वत दे कर, कर ले रहा है। विडम्बना ये की आज का समाज इस रिश्वत को खुले हाथों से स्वीकार भी कर रहा है लेकिन उसके कृत्यों से समाज को हुई क्षति के प्रति कोई जागरुकता किसी मे दिखाई नहीं देती। हमारा वर्तमान समाज भर पड़ा है ऐसी मूर्तियों से और हम "मूर्ति उपासक" भी लगे रहते हैं उपासना में। सामाजिक समस्याओं को हमने राष्ट्रीय बना दिया है और उसके निवारण के लिये हम राष्ट्रीय और सरकारी पहल की बात जोहने लगे हैं।
एक उदाहरण देता हूँ, 'स्वच्छता' एक सामाजिक विषय और समस्या हुई करती थी। अभी कुछ सालों पहले तक, गाँव में लोग भले खुले में शौच करते थे लेकिन गाँव से दूर करते थे। इस नियम से छूट केवल कुछ लोगों को होती थी जो अक्सर, बूढ़े या बीमार या गर्भस्थ महिलाएं हुआ करती थी। उस अस्वच्छ कृत्य में भी गाँव की स्वच्छता के विचार को अस्वीकार नहीं किया जाता था। आज स्वच्छता के लिये एक पूरे राष्ट्रीय आंदोलन की आवश्यकता पड़ गयी और आंदोलन आया भी तो उसे असफल करने और और उसकी हंसी उड़ाने वालों की एक पूरी सेना भी आ गयी। मित्रों, यदि एक परिवार इसलिये सफल नहीं हो सकता कि उसका कोई एक सदस्य उसकी अपेक्षाओं को पुरा नहीं कर पा रहा तो एक समाज और एक राष्ट्र तो अपने आप में परिवारों का ही संकलन है।
कुछ और उदाहरण रखता हूँ हमारी वर्तमान सामाजिक उदासीनता के।
अब कोई यातायात नियमों के उल्लंघन करने वालों को नहीं टोकता
बहनों के साथ होने वाली छेड़खानी की घटनाओं का कोई विरोध नहीं करता
अब के बच्चे, रिश्तेदारों के यहां रह कर नहीं पढ़ते
अब सम्बन्धियों के यहाँ हम समारोहों में सहयोगी बन कर नहीं बल्कि तमाशबीन बन कर लंगर खाने जाते हैं।
समाजिक बन्धन की यह रस्सी, हम और आप जैसे पतले पतले धागों को मिला कर बनी हुई है और हर धागे की कमजोरी रस्से को कमजोर ही करती है। सम्भाहलें इसे, इसके पहले की यह रस्सी टूट जाये। ऐसा नहीं है कि हममें से कोई भी इतना बलवान है कि इसका असर उस पर नहीं पड़ेगा। समाज के टूटने के बाद, टूटने का अगला क्रम परिवार का ही होगा। विश्वास न हो मेरी बात पर तो एक निगाह अपने आस पड़ोस में डाल लीजिये। कोई एक टूटा परिवार अवश्य मिल जायेगा जो समाज से कटा हुआ रहता था।

अविनाश कुमार

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