आज जिस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ वह हम सबसे जुड़ा हुआ है। यह विषय 16 दिसम्बर 2012 के बाद कम से कम तीन महीनों तक भारतीय प्रसार माध्यमों का अगर एकमात्र नहीं तो सबसे बड़ा विषय अवश्य था। परन्तु उसके बाद यह पृष्ठभूमि पर एक तारे की तरह कभी कभी प्रकट हो जाता है। विषय है "बलात्कार"। भारत में विकास स्वच्छता, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के बाद सबसे बड़ी जो चुनौती है वह बलात्कार ही है। परंतु क्या यह इतनी बड़ी चुनौती जितनी दिखाई या बताई जा रही है। इसी पर मेरे विचार हैं इस लेख में।
बलात्कार ऐसा विषय है जिसको पिछले कुछ वर्षों में भारत मे एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसको ऐसा रोग बताया गया है जिसमें रोग स्वयं और रोगी दोनों ही असाध्य हैं। इसको एक नयी और उभरती एवं नित फैलती हुई बीमारी के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है और इसके अनेकानेक कारण बताए जाते हैं। सच्चाई यह है कि यदि वेश्यावृत्ति दुनिया का सबसे पुराना करोबार है तो बलात्कार दुनिया का सबसे पुराना अपराध है। प्रकृति और प्रवृति दोनों की समान है, दूरी एक बाल बराबर की है। एक में एक आर्थिक समझौता होता है और दूसरे में एकतरफा राक्षसी भूख। किंतु इतना कुछ स्पष्ट करने के बाद भी, चुनौती वहीं की वहीं, इस समस्या का समाधान क्या है।
विगत कई वर्षों में इस समस्या के नाना हल कई तथाकथित विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत किये गए हैं। अधिकतर ने इस समस्या का मूल कारण अपराधी को बताया है। जिस किसी ने भी पीड़ित को इस समस्या का कारण बताया है उस पर सारा समाज इस तरह से हमला बोल दिया है जैसे अपराधी वही है। स्पष्ट कहूँ तो कई बार इन समाधानों को सुन कर उस व्यक्ति की विशेषज्ञता पर शंका भी होने लगती है। वर्तमान में इस समस्या ने उस गंदे नाले का रूप ले लिया है जिसके बगल से नाक पर कपड़ा रख कर सब निकल जाते हैं और घर जा कर इसके सफाई को ले कर लेख और आंदोलन पर परिचर्चा करते हैं। सुझाव सब देते हैं परंतु हाथ कोई नहीं लगाना चाहता। कारण है, आप कितनी भी सावधानी से सफाई करें, शरीर मे गन्दगी लगने की पूरी संभावना है।
यहां तक तो विषय के गम्भीरता को लेकर चर्चा हुई। अब जरा नज़र इसके पात्रों पर डालते हैं। एक एक कर सबका वर्णन करूँगा।
पहली पात्र है पीड़िता, यह वो पात्र है जिसका हर हाल में हानि ही है। यह पूरे द्वंद में सबसे शक्तिशाली कड़ी है लेकिन इसके मष्तिष्क में यह कूट कूट कर भर दिया गया है यह सबसे कमजोर कड़ी है। मेरे इस कथन से आप में से कई असहमत होंगे, परन्तु इसकी चर्चा भी आगे लेख में करूँगा, धैर्य रखें।
दूसरा पात्र होता है अपराधी। यह वो पात्र है जिसके अनुसार वह सबसे शक्तिशाली है इस पूरे घटनाक्रम में। सफलता मिलने की स्थिति में वह अल्पकालिक विजेता भी होता है और यदि पीड़िता थोड़ा भी कमजोर पड़ी तो विजेता भी यही होता है।
तीसरा पात्र होता है मूक श्रोता का जो सुनता है और चुप, फिर सुनता है और फिर चुप। यह वो समूह है जो हर परिस्थिति में केवल रोना और चुप रहना जानता है, इसके अतिरिक्त केवल एक काम यह बड़ी तन्मयता से करता है और वो है पराजित का परिहास।
चौथा और सबसे धृणित पात्र होता है इस पूरे घटना के व्यापारी का। सम्मान किसी का, जान किसी की, व्यापार इनका। जीता कोई, हारा कोई, व्यापार इनका। मामला ठंडा हुआ, चार विशेषज्ञ बुलाओ, फिर हवा दो, फिर कमाओ। न्यायालय से निर्णय आया, पराजित को उकसाओ , उच्च न्यायालय जाओ, फिर कमाओ। घृणा होती है सोच और देख कर। भगवान न करे लेकिन हे लकड़बग्घों, कभी तुम्हारे साथ भी ऐसा ही हो सकता है, तब भी क्या यही करोगे? विडंबना देखिये की हम सुनते भी सबसे ज्यादा इन्ही की हैं। आप मुझे भी संभवतः इन्हीं चौथे पात्रों में से एक समझ रहे होंगे। लेकिन नहीं मैं वह पांचवां पात्र हूँ जो इस घटनाक्रम का सूत्रधार नहीं तो अनजाने में पटकथा लेखन में योगदान अवश्य देता है।
मैं अभिभावक हूँ, मुझे पुत्र भी हो सकता है और कन्या भी, मेरी संतान पीड़िता भी हो सकती है और अपराधी भी। यह परिणाम पूरी तरह मेरी सोच, समझ, शिक्षा और संस्कार पर निर्भर करता है। इस पूरे घटनाक्रम में, मैं किसी का भी अभिभावक हूँ, विश्वास करें मैं जीवन भर उस दर्द को भूल नहीं सकता, वह काटता रहेगा मुझे। भगवान के आशीर्वाद से मुझे भी दो कन्यायें हैं और इस लेख को मैं, एक अभिभावक के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप भी यदि एक अभिभावक की तरह ही पढ़ेंगे तो श्रम सार्थक होगा मेरा। विचार थोड़े विवादास्पद व सम्भवतः कुछ लोगों के लिये अश्लील भी हो सकते हैं परंतु यदि नाले की सफाई करनी है तो, गन्दगी लगने का डर छोड़ना होगा।
एक पुत्र के अभिभावक को क्या शिक्षा देनी चाहिये, क्या नहीं, इस पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। इसलिए इस अध्याय को मैं नहीं छेड़ूँगा। मैं एक कन्या के अभिभावक के रूप में अपने विचार रखूंगा।
कन्याओं के विषय में जब भी बात होती है दो प्रसंग अवश्य आते हैं। एक उनका पहनावा और दूसरा उनका अबला होना या निर्बल होना। तीसरे किसी सार्थक प्रसंग की कोई चर्चा कभी भी नहीं होती है, सत्य भी है। सारी घटनाओं में कम से कम इनमें से एक तो अवश्य होता है। दोनों पर विचार रखूंगा।
पहला है, बच्चियों के पहनावा। बहुत तरह के विचार हैं समाज में इस विषय पर, परन्तु एक वाद जो सबसे भारी पड़ता है वो है स्त्रियों की वैचारिक स्वतंत्रता का। इस विचार के आगे सब नतमस्तक। उसकी स्वतंत्रता तो है, चयन की, परन्तु चयन की सामग्री क्या है उसके पास। फिल्मों में बर्फ पर पूरे कपड़े पहने नायक के साथ अर्धनग्न नायिका, मंच पर पूरी कपड़े पहने निर्देशक के साथ अर्धनग्न संचालिका? उदाहरण क्या है उसके पास चयन करने के लिये, वह नारियाँ जिनके साथ हमेशा अंगरक्षक होते हैं। यह हमारा ऊत्तरदायित्व है समझाना उसे, कि बच्चियों कपड़े तन की सुरक्षा के लिए हैं, सजावट के लिए नहीं। स्त्रियों को स्वतंत्रता यदि छोटे कपड़े पहनने से मिलती है तो पुरुष तो अभी हिमयुग में जी रहे हैं। मेरे इस विचार पर मुझे भगवा, तालिबानी, रूढ़िवादी और न जाने क्या क्या अलंकरणों से सम्मानित किया जाएगा, परन्तु विरोध से बच्चियां सुरक्षित तो नहीं होंगी। बच्चियां प्रदर्शन सामग्री नहीं हैं, प्रभु ने उन्हें भी समान अधिकार के साथ भेजा है। यह बात उस बेटी के मष्तिष्क में अभिभावक को डालना है कि कपड़े जितने छोटे आप उतनी असुरक्षित। समाज में भेड़िये, आदि काल से हैं और अंत तक रहेंगे लेकिन मेरी बेटी इन भेड़ियों पर बली के लिए नहीं पैदा हुई है।
दूसरा प्रसंग है स्त्रियों के निर्बलता का। मेरी बेटी फूलों सी नाजुक है, पलकों पर बिठा कर रखा है इसे और न जाने क्या क्या। बेटी है या कोई अपंग, दिव्यांग और लाचार प्राणी। भूल जाएं सब। यह सारे वक्तव्य ही उसे अबला बना रहे हैं। वह कितनी शक्तिशाली है, मैं बताता हूँ। सारे विवाहित पुरुष और स्त्रियां जानती हैं कि यदि नारी न चाहे तो एक पुरुष उससे कोई सन्सर्ग, समागम, सम्भोग नहीं कर सकता। यथार्थवादी बनें और स्वीकार करें। वह आपकी विवाहिता ही क्यों न हो, उसके समर्पण के बिना यह सम्भव नहीं है। समर्पण तभी होगा जब विरोध असफल होगा और यदि विरोध क्रूर होगा तो नारी विजयी। यह क्रूरता एक मानसिकता है जिसका अंश जितना एक स्त्री में होता है उतना पुरुष में नहीं। विश्वास न हो, चिकित्सा क्षेत्र पर निगाह दौड़ायें। बेटियों को तैयार करने की आवश्यकता है बुरी से बुरी परिस्थिति के लिये। इतिहास में भी नारियां कपड़े और बालों में छुरे और कृपाण छुपा कर रखती थीं। क्या स्त्रियों की वो अलग नस्ल थी, नहीं हम उन्ही की संतानें हैं और हमारे संस्कार भी उन्ही के बनाये हुए हैं।आवश्यकता है बच्चियों में सबल विरोध के मानसिकता के विकास की। यह कार्य जितने अच्छे से एक माँ कर सकती है उतना कोई नहीं, और वो भी अभिभावक है।
अविनाश कुमार
विगत कई वर्षों में इस समस्या के नाना हल कई तथाकथित विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत किये गए हैं। अधिकतर ने इस समस्या का मूल कारण अपराधी को बताया है। जिस किसी ने भी पीड़ित को इस समस्या का कारण बताया है उस पर सारा समाज इस तरह से हमला बोल दिया है जैसे अपराधी वही है। स्पष्ट कहूँ तो कई बार इन समाधानों को सुन कर उस व्यक्ति की विशेषज्ञता पर शंका भी होने लगती है। वर्तमान में इस समस्या ने उस गंदे नाले का रूप ले लिया है जिसके बगल से नाक पर कपड़ा रख कर सब निकल जाते हैं और घर जा कर इसके सफाई को ले कर लेख और आंदोलन पर परिचर्चा करते हैं। सुझाव सब देते हैं परंतु हाथ कोई नहीं लगाना चाहता। कारण है, आप कितनी भी सावधानी से सफाई करें, शरीर मे गन्दगी लगने की पूरी संभावना है।
यहां तक तो विषय के गम्भीरता को लेकर चर्चा हुई। अब जरा नज़र इसके पात्रों पर डालते हैं। एक एक कर सबका वर्णन करूँगा।
पहली पात्र है पीड़िता, यह वो पात्र है जिसका हर हाल में हानि ही है। यह पूरे द्वंद में सबसे शक्तिशाली कड़ी है लेकिन इसके मष्तिष्क में यह कूट कूट कर भर दिया गया है यह सबसे कमजोर कड़ी है। मेरे इस कथन से आप में से कई असहमत होंगे, परन्तु इसकी चर्चा भी आगे लेख में करूँगा, धैर्य रखें।
दूसरा पात्र होता है अपराधी। यह वो पात्र है जिसके अनुसार वह सबसे शक्तिशाली है इस पूरे घटनाक्रम में। सफलता मिलने की स्थिति में वह अल्पकालिक विजेता भी होता है और यदि पीड़िता थोड़ा भी कमजोर पड़ी तो विजेता भी यही होता है।
तीसरा पात्र होता है मूक श्रोता का जो सुनता है और चुप, फिर सुनता है और फिर चुप। यह वो समूह है जो हर परिस्थिति में केवल रोना और चुप रहना जानता है, इसके अतिरिक्त केवल एक काम यह बड़ी तन्मयता से करता है और वो है पराजित का परिहास।
चौथा और सबसे धृणित पात्र होता है इस पूरे घटना के व्यापारी का। सम्मान किसी का, जान किसी की, व्यापार इनका। जीता कोई, हारा कोई, व्यापार इनका। मामला ठंडा हुआ, चार विशेषज्ञ बुलाओ, फिर हवा दो, फिर कमाओ। न्यायालय से निर्णय आया, पराजित को उकसाओ , उच्च न्यायालय जाओ, फिर कमाओ। घृणा होती है सोच और देख कर। भगवान न करे लेकिन हे लकड़बग्घों, कभी तुम्हारे साथ भी ऐसा ही हो सकता है, तब भी क्या यही करोगे? विडंबना देखिये की हम सुनते भी सबसे ज्यादा इन्ही की हैं। आप मुझे भी संभवतः इन्हीं चौथे पात्रों में से एक समझ रहे होंगे। लेकिन नहीं मैं वह पांचवां पात्र हूँ जो इस घटनाक्रम का सूत्रधार नहीं तो अनजाने में पटकथा लेखन में योगदान अवश्य देता है।
मैं अभिभावक हूँ, मुझे पुत्र भी हो सकता है और कन्या भी, मेरी संतान पीड़िता भी हो सकती है और अपराधी भी। यह परिणाम पूरी तरह मेरी सोच, समझ, शिक्षा और संस्कार पर निर्भर करता है। इस पूरे घटनाक्रम में, मैं किसी का भी अभिभावक हूँ, विश्वास करें मैं जीवन भर उस दर्द को भूल नहीं सकता, वह काटता रहेगा मुझे। भगवान के आशीर्वाद से मुझे भी दो कन्यायें हैं और इस लेख को मैं, एक अभिभावक के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप भी यदि एक अभिभावक की तरह ही पढ़ेंगे तो श्रम सार्थक होगा मेरा। विचार थोड़े विवादास्पद व सम्भवतः कुछ लोगों के लिये अश्लील भी हो सकते हैं परंतु यदि नाले की सफाई करनी है तो, गन्दगी लगने का डर छोड़ना होगा।
एक पुत्र के अभिभावक को क्या शिक्षा देनी चाहिये, क्या नहीं, इस पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। इसलिए इस अध्याय को मैं नहीं छेड़ूँगा। मैं एक कन्या के अभिभावक के रूप में अपने विचार रखूंगा।
कन्याओं के विषय में जब भी बात होती है दो प्रसंग अवश्य आते हैं। एक उनका पहनावा और दूसरा उनका अबला होना या निर्बल होना। तीसरे किसी सार्थक प्रसंग की कोई चर्चा कभी भी नहीं होती है, सत्य भी है। सारी घटनाओं में कम से कम इनमें से एक तो अवश्य होता है। दोनों पर विचार रखूंगा।
पहला है, बच्चियों के पहनावा। बहुत तरह के विचार हैं समाज में इस विषय पर, परन्तु एक वाद जो सबसे भारी पड़ता है वो है स्त्रियों की वैचारिक स्वतंत्रता का। इस विचार के आगे सब नतमस्तक। उसकी स्वतंत्रता तो है, चयन की, परन्तु चयन की सामग्री क्या है उसके पास। फिल्मों में बर्फ पर पूरे कपड़े पहने नायक के साथ अर्धनग्न नायिका, मंच पर पूरी कपड़े पहने निर्देशक के साथ अर्धनग्न संचालिका? उदाहरण क्या है उसके पास चयन करने के लिये, वह नारियाँ जिनके साथ हमेशा अंगरक्षक होते हैं। यह हमारा ऊत्तरदायित्व है समझाना उसे, कि बच्चियों कपड़े तन की सुरक्षा के लिए हैं, सजावट के लिए नहीं। स्त्रियों को स्वतंत्रता यदि छोटे कपड़े पहनने से मिलती है तो पुरुष तो अभी हिमयुग में जी रहे हैं। मेरे इस विचार पर मुझे भगवा, तालिबानी, रूढ़िवादी और न जाने क्या क्या अलंकरणों से सम्मानित किया जाएगा, परन्तु विरोध से बच्चियां सुरक्षित तो नहीं होंगी। बच्चियां प्रदर्शन सामग्री नहीं हैं, प्रभु ने उन्हें भी समान अधिकार के साथ भेजा है। यह बात उस बेटी के मष्तिष्क में अभिभावक को डालना है कि कपड़े जितने छोटे आप उतनी असुरक्षित। समाज में भेड़िये, आदि काल से हैं और अंत तक रहेंगे लेकिन मेरी बेटी इन भेड़ियों पर बली के लिए नहीं पैदा हुई है।
दूसरा प्रसंग है स्त्रियों के निर्बलता का। मेरी बेटी फूलों सी नाजुक है, पलकों पर बिठा कर रखा है इसे और न जाने क्या क्या। बेटी है या कोई अपंग, दिव्यांग और लाचार प्राणी। भूल जाएं सब। यह सारे वक्तव्य ही उसे अबला बना रहे हैं। वह कितनी शक्तिशाली है, मैं बताता हूँ। सारे विवाहित पुरुष और स्त्रियां जानती हैं कि यदि नारी न चाहे तो एक पुरुष उससे कोई सन्सर्ग, समागम, सम्भोग नहीं कर सकता। यथार्थवादी बनें और स्वीकार करें। वह आपकी विवाहिता ही क्यों न हो, उसके समर्पण के बिना यह सम्भव नहीं है। समर्पण तभी होगा जब विरोध असफल होगा और यदि विरोध क्रूर होगा तो नारी विजयी। यह क्रूरता एक मानसिकता है जिसका अंश जितना एक स्त्री में होता है उतना पुरुष में नहीं। विश्वास न हो, चिकित्सा क्षेत्र पर निगाह दौड़ायें। बेटियों को तैयार करने की आवश्यकता है बुरी से बुरी परिस्थिति के लिये। इतिहास में भी नारियां कपड़े और बालों में छुरे और कृपाण छुपा कर रखती थीं। क्या स्त्रियों की वो अलग नस्ल थी, नहीं हम उन्ही की संतानें हैं और हमारे संस्कार भी उन्ही के बनाये हुए हैं।आवश्यकता है बच्चियों में सबल विरोध के मानसिकता के विकास की। यह कार्य जितने अच्छे से एक माँ कर सकती है उतना कोई नहीं, और वो भी अभिभावक है।
अविनाश कुमार
पहले तो सामाजिक स्तर पर व्यवहारिक शिक्षा के स्तर को बढ़ावा देना चाहिए उसका आधुनिकीकरण और प्रोत्साहन होना अनिवार्य है ताकि इस व्यवहारिक शिक्षा में ना सिर्फ कम शिक्षित बल्कि एक शिक्षित व्यक्ति भी इसकी ओर आकर्षित हो और बेरोजगारी की समस्या का निवारण हर स्तर पे हो ।।
ReplyDeleteबहुत बेह तरिन लेख, कुछ बिंदु और जोड़े।
ReplyDeleteएंटरटेनमेंट के नाम पर अश्लीलता फैलाया जा रहा पर सभी कुछ कहते नहीं, सेंसर बोर्ड बस खून करने और ज्यादा अश्लील होने पर एक्टिव होते।
बिटिया को बेटो के बराबर हक के साथ समझ भी देना उचित उपाय है।