आज पुनः एक विषय को उठाने का मन कर रहा है। विषय पिछली बार की तरह कभी कभी और कहीं कहीं उभरने वाली समस्या नहीं है। विषय निरन्तर, सबके द्वारा और पूरे जीवन भर लड़ी जाने वाली लड़ाई और उस पर विजय पाने के प्रयास के बारे में है। विषय है "बेरोज़गारी". विषय अवष्य बेेेेरोजगारी है परन्तु इसे शिक्षा से पृथक कर देखना एक वैचारिक अपराध होगा. इसलिए विषय है "बेरोज़गारी और उसमें शैक्षिक ढांचे का योगदान"। विषय पिछली बार से अलग है परन्तु सुझाव पुनः क्रांतिकारी व विवादास्पद ही रहेगा।
पहले बेरोजगारी पर ही विचार करते हैं, शिक्षा पर तत्पश्चात आयेंगे। भारत में बेरोज़गारी क्या इतनी बड़ी समस्या है जितनी प्रदर्शित की जा रही है या उससे बड़ी या छोटी है? ईमानदारी से कहूं तो मेरी समझ से भारत में बेरोज़गारी की समस्या ही नहीं है। समस्या है अकारगर रोज़गार प्रबंधन। रोज़गार प्रबंधन से मेरा तात्पर्प रोजगार सृजन से नहीं है, बल्कि रोज़गार विभाजन से है। बहुत बड़े बड़े शब्द हैं, समझना कठिन हो रहा है किंतु धैर्य रखें।
भारत या विश्व में कहीं भी रोजगार को चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
पहले बेरोजगारी पर ही विचार करते हैं, शिक्षा पर तत्पश्चात आयेंगे। भारत में बेरोज़गारी क्या इतनी बड़ी समस्या है जितनी प्रदर्शित की जा रही है या उससे बड़ी या छोटी है? ईमानदारी से कहूं तो मेरी समझ से भारत में बेरोज़गारी की समस्या ही नहीं है। समस्या है अकारगर रोज़गार प्रबंधन। रोज़गार प्रबंधन से मेरा तात्पर्प रोजगार सृजन से नहीं है, बल्कि रोज़गार विभाजन से है। बहुत बड़े बड़े शब्द हैं, समझना कठिन हो रहा है किंतु धैर्य रखें।
भारत या विश्व में कहीं भी रोजगार को चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- अशिक्षित व अकुशल : दैनिक मज़दूर
- अशिक्षित व कुशल : राज मिस्त्री, बढ़ई, दर्ज़ी इत्यादि
- शिक्षित व अकुशल : चपरासी, सिपाही इत्यादि और
- शिक्षित व कुशल : डॉक्टर, इंजीनयर, वकील इत्यादि
यहाँ पर श्रम विभाजन की कला और कुशलता की आवश्यकता है। पहले तीसरे और चौथे श्रेणी में आप एक श्रमिक ढूंढे, पचास मिलेंगे किन्तु जैसे ही दूसरे श्रेणी के श्रमिक की आवश्यकता होती है, पूरा पटल ही पलट जाता है। कारण है, शिक्षा व्यवस्था पूरी की पूरी "शिक्षित और कुशल" श्रमिक के उत्पादन को ध्यान में रख कर बनाई गई है और कहीं भी यह नहीं सोचा गया है कि विद्यार्थी के असफलता की परिस्थिति में क्या होगा। भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इस बात को समझा है और कौशल विकास योजना (Skill India Mission) चलाया है किंतु हर साल आने वाली बाढ़ का सामना, झाड़ू लगाने से नहीं हो पायेगा, उसके लिए एक बांध की आवश्यकता होती है।
कौशल विकास योजना, अच्छी है। यह वर्तमान में "अशिक्षित अकुशल और शिक्षित अकुशल श्रमिक" वर्ग को संवारने के उद्देश्य से बनाई गयी है। यह कितना सफल होती है, यह तो काल के गाल में है किंतु भविष्य में पुनः यह परिस्थिति उत्पन्न न हो इसके लिए हमें और सरकार को कहीं न कहीं ढांचे में मूलभूत परिवर्तन के बारे में सोचना होगा। मूलभूत क्यों, क्योंकि, कोई भी चिकित्सक हमें आयरन, विटामिन, कैल्सियम और तमाम औषधियां दे कर यह नहीं कहता कि भूंसा भोजन (Junk Food) खाने के बाद इन्हें खा लीजियेगा। वह हमें भोजन में परिवर्तन की सलाह देता है और यहां भी यही चाहिये।
रोजगार की इस समस्या या पीड़ा के लिए औषधि का काम कर सकता है शिक्षा। केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक शिक्षा। शिक्षा कम और व्यवहारिकता अधिक। व्यवहारिकता पर में बहुत अधिक बल प्रयोग कर रहा हूँ और पूरे लेख के अंत तक करता रहूंगा। आज की शिक्षा व्यवस्था केवल और केवल, चौथे श्रमिक वर्ग (शिक्षित व कुशल) के लिए सम्वर्धन गृह (Nursery) का काम कर रही है। सफल हो गए तो सफल और यदि असफल तो, एक दैनिक मज़दूर से ऊपर उठने के लिए आप के पास कुछ नहीं है। फिर शिक्षा व्यवस्था आप का साथ नहीं देती, आप स्वयं के ज्ञान, विवेक और कला के सहारे आगे बढ़ें। आप सचिन तेंदुलकर हों या शाहरुख खान, यही सत्य है। व्यवस्था ने हमें बहुत सारे IAS, Engineer और Doctor तो दिये हैं किंतु एक भी खिलाड़ी, एक भी संगीतकार या कलाकार का नाम बतायें जो इस व्यवस्था से निकला हो, और मैं तो बढ़ई, नाई, कुम्हार और दर्जी की बात कर रहा हूँ। यदि उनको, आप की व्यवस्था कुछ नहीं दे सकती तो वो इस व्यवस्था से क्यों कर जुड़ें, पोषाहार और अल्पाहार के लिये! क्षमा चाहता हूं किन्तु वो आप की अपेक्षा निर्धन अवश्य हैं किंतु स्वावलंबी है, आत्मसम्मानी हैं। उनके गुणों का सम्मान करें और आप स्वयं को और स्वयं की व्यवस्था और उसमें समुचित परिवर्तन के बारे में सोचें। यदि अभी भी मुझसे असहमत हैं और असमंजस की स्थिति बनी हुई है तो उदाहरण के साथ स्पष्ट करता हूँ।
हम केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) का उदाहरण लेते हैं. दसवीं उत्तीर्ण करने के लिए पांच विषयों में पारंगत होना आवश्यक है, ये पांच विषय क्या हैं:
- अंग्रेजी : 99% भारतीयों को कोई सरोकार नहीं
- हिंदी या कोई अन्य भारतीय भाषा : इसका व्यवहारिक ज्ञान हमें विद्यालय में नहीं मिलता
- गणित : सामान्य जीवन की आवश्यकता की व्यवहारिकता हमें पांचवीं तक पढ़ा दी जाती है
- विज्ञान व सामाजिक विज्ञान : इन विषयों का सामान्य नागरिक के जीवन मे कितना व्यवहारिकता है और कितना ज्ञान हमें दसवीं तक मिलता है, इससे हम सब अवगत हैं
कहाँ हैै छठा विषय जो हमें बढ़ई, कुम्हार, नाई, दर्जी तो छोड़िए खिलाड़ी, संगीतकार या कलाकार भी दे सकता है। जब हमारे क्रिकेट टीम में डॉ• विराट कोहली नहीं हैं तो क्या हमारे बाल डॉ• जुम्मन काटेंगे? यदि हम जुम्मन को उसके विधा में पारंगत होने की शिक्षा विद्यालय में नहीं दे रहे हैं तो उसके विद्यालय आने का क्या औचित्य है। दसवीं का अंकपत्र तो उसके लिये केवल जन्मतिथि प्रमाण पत्र ही है।
यहां तक तो हुई व्यवहारिकता के अनुपस्थिति की बात, परंतु इसके परिचय कैसे हो प्रणाली में यह प्रश्न तो अभी भी अनुत्तरित ही है। यहां मेरे जो सुझाव आएंगे, वह विवादास्पद अवश्य हैं और उनका क्रांतिकारी होना न होना, उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। सुझाव बहुत ही बड़े परिवर्तन के हैं। सकारात्मक परिवर्तन के हैं और क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है।
मेरे सुझाव के अनुसार, कक्षा पांचवी तक तो कोई बदलाव नहीं है, परन्तु उसके बाद पूरे के पूरे शैक्षिक जंगल को उजाड़ कर नया वृक्षारोपण कर देना चाहिए। अभी जितने भी विषय हैं उनके अतिरिक्त, व्यवहारिक और कलात्मक विषयों का शिक्षण व प्रशिक्षण भी शामिल किया जाय। कक्षा दस में वर्तमान में जिन विषयों या विषयों के मेलों में से एक चुनने की बाध्यता है, उसे समाप्त किया जाये। विषयों की संख्या तो उतनी ही रखी जाय किन्तु वह कौन कौन से हों, इसके चुनाव का अधिकार विद्यार्थी के पास हो न की संस्थान के पास। इस व्यवस्था में प्रारम्भ में विषयों के मेल के चुनाव में समस्या आएगी, किन्तु अल्पकालीन।
दिमाग में प्रश्न उठ रहे होंगे कि लाभ क्या होगा:
- विद्यार्थी छठीं के बाद विद्यालय छोड़ता है या दसवीं के बाद, उसके पास एक विधा होगी रोज़गार या जीवनयापन के लिए
- वह वर्ग जो गणित, विज्ञान या अंग्रेज़ी की असमर्थता के कारण विद्यालय से किनारा कर रहा था, वो जुड़ेगा
- नये अनुसंधानिक तकनीकें, प्रजा तक आसानी से पहुंच सकेंगी
- सेवा क्षेत्र, जिसमें भारत पूरे विश्व मे एक अग्रणी प्रतिभागी है, उसमें हर वर्ष, नवीन और कुशल श्रमिक क्षमता का जुड़ाव होगा बिना किसी अतिरिक्त प्रशिक्षण के।
यह उपर्युक्त कारण भी यादि कारगर नहीं हो सकते इस नवीन व्यवस्था के लिये, तब यह व्यवस्था निरर्थक है और यदि कोई बेहतर व्यवस्था सुझाई जा सके तब उसका भी स्वागत किया जाय। आवश्यकता है एक सकारात्मक सोच के साथ इस सीना ताने संकट के समाधान, मैंने अपने विवेक से विचार प्रस्तुत किया, आगे सरकारों की इच्छा।
बहुत खूब भाई लिखा तो सहीं है बेरोजगारी की समस्या घट सकती है अगर घटाया जाए तो असल में यह समस्या थी ही नही किन्तु सरकार समाज और लोगो के व्यहवार ने इसे एक समस्या बना दिया...
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